मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

उड़ते परिंदे

fly high to return back

Pic Courtesy: Meri Syahi Ke Rang

जो उन्मुक्त गगन में उड़ते है
वो भी अपने घरों को लौटते है
स्वछन्द विचार कितने भी हो
घर की चार दीवारी से टकराते है
पाने को सारा खुला आसमान है
खोने को कुछ गज़ का मकान है

थक कर चूर जब हो जाओ
पंखो को विराम भी दो
पीछे छूटे साथी का इंतज़ार भी हो
लौट आओ जब संध्या हो
उड़ने की कोई वजह ना हो
छोटी सी ज़िंदगानी है
अपनों संग भी बितानी है
जीत के तुम संसार को
हार ना जाना परिवार को

मुट्ठी भर दिन जीवन के
कुछ सपनो में, कुछ उड़ने में
बोलो धरती पर लौटोगे कब
रिश्तो की बगिया में महकोगे कब
जो उन्मुक्त गगन में उड़ते है
वो भी अपने घरों को लौटते है

छोटी सी उम्र में सपने बड़े
जिनसे सीखा उड़ना उनको क्यों कुचल चले
सूरज तक तुमको पहुँचना है
बादल के संग ही उड़ना है
अनुभव और परिश्रम बिन
जीत का फल भी खट्टा है

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत प्रभावपूर्ण रचना......
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपके विचारों का इन्तज़ार.....

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    1. बहुत शुक्रिया सर आपके ब्लॉग की रचनाएँ पढ़ने के लिए उत्सुक हूँ जुड़ने के लिए धन्यवाद्

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  2. कितना सही चित्रण किया है आपमें एक बड़े वर्ग को अपनी रचनाओं के माध्यम से दिशा दिखाने की क्षमता है ...शुक्रिया आपके कहे शब्दों का मर्म समझ चुका हूँ जीवन में उतारने की कोशिश करूँगा

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  3. हम जैसे नवयुवको के लिए आपकी रचनाये प्रेरणा का स्रोत है ...आशा है आप हमेशा हमें ऐसे ही लाभान्वित करती रहेंगी
    बहुत शुक्रिया ...आपकी रचनाये पढ़कर नयी राह नज़र आती है बदलते वक्त के साथ ऐसे लेखन की ज़रूरत है जो भटकते नौजवानो को सही रास्ता दिखा सके...आशा है आपकी कविताये एक बार फिर राष्ट्र निर्माण में सहयोग देंगी

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    1. आपका बहुत शुक्रिया ...हमेशा यही कोशिश रहेगी

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  4. Jo unmukt Hagan mein update Hai...Wah Kya khub likha Hai aapne

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