शनिवार, 11 नवंबर 2017

ज़हरीला इंसान और लोक कथाएं










Pic Courtesy: स्त्री काल 
ज़हर खुद उगलते है 
इल्ज़ाम हम पर लगाते है 

ज़िक्र कहानियो का करते है 
दास्ताँ अपनी सुनाते है  

रुसवा सरे राह करके बार बार 
हमसे प्यार का इज़हार चाहते है 

बदल गए ज़माने के रंग मगर 
बेरहम औरत की तकदीर निकली 


गुरुवार, 2 नवंबर 2017

आज़ादी -New Woman

New Woman
Courtesy: The happy world.com
कुछ गफलत में ज़माना है
मौन तोड़ उसे बताना है
किस्मत बुलंद है मेरी
बारी है पत्थरो के पिघलने की
सहनशक्ति ताकत है मेरी
सहना मेरी मज़बूरी नहीं

हार जीत में बदल दूंगी
इरादे नेक है,रास्ते अनेक है
सफर किया तेरे साथ जितना
सफर तय कर सकती हूँ
सपनो की मंज़िल का
सहनशक्ति ताकत है मेरी
सहना मेरी मज़बूरी नहीं

संस्कार की बलिवेदी तुझे प्रणाम
बांधने लगी जब ज़ंज़ीरे
जकड़ने लगी जब तकदीरे
उन्मुक्त गगन से पता पूछा
एक नयी मंज़िल का
बांहे पसार तैयार हूँ उड़ने को
सहनशक्ति ताकत है मेरी
सहना मेरी मज़बूरी नहीं



शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

धुँए में ज़िन्दगी ...( नशा ही नशा है )

Pic Courtesy : Word Press.com

नशे में है जग सारा 
कही नींद कहीं 
मह का साया 
कही सौंदर्य जाल
कही ग्लैमर की माया 
लड़खड़ाए कदम
बहकी आवाज़ें
नशे की गिरफ्त में 
शरीर से..आत्मा ज्यादा 
बातें कुछ कम
शोर बहुत ज्यादा 
साहस सिमटा
दंभ ने घेरा
मंद पड़ती जिज्ञासाएं
तीव्र होती आकांक्षाएं 
जल्दबाज़ी में बढ़ती ज़िंदगिया 
देरी से मिलती राहें
फिर भी पहचान ना पाए 
क्यों खो रही हैं
तेरी मेरी नयी राहें


शनिवार, 16 सितंबर 2017

ओल्ड इस गोल्ड

Missing Gold
Pic Courtesy :Flickr
सरलता सहजता 
गुम जब से हो गयी
ज़िन्दगी अजनबी 
कुछ और बन गयी है 

दोस्त बन रहे है
तकनीक और तेजी 
मिलावट का नया 
दस्तूर बन गया है 

मिठास की जगह 
मीठी बातों ने ली है 
अपनों की जगह 
बेगानो की झड़ी है 

सादगी की जगह 
भड़कते श्रृंगार ने ली है 
प्रकृति का मोल घटा 
विकसित नई पीढ़ी हुई है 

ओल्ड इस गोल्ड 
कहते है क्यों सोचो
खो गया है क्या 
बदलते युग की भीड़ में देखो

सरलता सहजता 
गुम जब से हो गयी
ज़िन्दगी अजनबी 
कुछ और बन गयी है 

बुधवार, 6 सितंबर 2017

नींव का सोना

Strong foundation








Pic Courtesy:Midday
सोना पिघलकर जब शख्सियत में तब्दील होता है 
दमक ललाट की अंधेरो में उजाला भर जाती है
पथरीले रास्तो पर चलकर घायल हुए जो इंसान
समय की आँधियो से लड़कर उभरे जो चेहरे
वही दीपक निराशाओ से लड़कर ज्योत जगाते है 

लहू और पसीने की कीमत जान कर बनी जो तकदीरे
वही पत्थर तराशकर अब हीरे को आकार देते है 
गुमनाम चेहरों को नाम तलाशने में मदद करते है 
हाथ से हाथ मिलकर बनता है कुछ ऐसे कारवां 
यही रैला चला जीवन की विषमताओं से लड़ने 

सफलताएं किसी थाली में सज कर नहीं मिलती
विषमताएं समाज की बिन आवाज़ उठाये नहीं मिटती
कितने दब जाते है नींव की मानिंद
कंगूरे बन जाते है श्रेय के हक़दार 
तालियों की गड़गड़ाहट  क्या छीन सकती है
किसी दमकते चेहरे की आभा 

सोमवार, 14 अगस्त 2017

वो सुबह कैसे आएगी ....

The dawn,Morning

Pic Courtesy:Fine Art America

इंतज़ार अभी तक बाक़ी है ..प्रश्न अभी कुछ बाक़ी है
वो सुबह कैसे आएगी ....बरस गए, हम तरस गए
शाखों के पत्ते कुछ सूख गए, कुछ टूट गए
उठते है जो कुछ कदम भी तो
उस जलती हुई शमा को यहाँ ...
घनघोर अँधेरा निगल जाये
वो सुबह कैसे आएगी ....
वो सुबह कैसे आएगी ....

कुछ आलम है कुछ बालम है सपनो के यहाँ सौदागर है
बहकते हुए कदमो के लिए सोने की यहाँ ज़ंज़ीरे है
चहकते हुए चेहरों के लिए ग्लैमर के सिवा न कोई छोर है
नींदो के भंवर में कश्ती फंसी ह्रदय के भंवर में सपने मरे
वो सुबह कैसे आएगी ....वो सुबह कैसे आएगी ....

प्रश्नो के बढ़े अम्बार यहाँ.. सवालो का ना कोई ज़िम्मेदार यहाँ
एक आगे बढ़ता है सौ पीछे हटते है
कागज़ के महल बनते है यहाँ, एक हस्ताक्षर से बिकते है वहां
पढ़ते है कहाँ ...बढ़ते है कहाँ ..माँ बाप को बोझ अभी तक कहते है यहाँ
ये सुबह कैसे आएगी
वो सुबह कैसे आएगी ....



शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

मौन सत्य

truth is silent
Pic Courtesy:VirtuaGYM
कहीं कुछ बह रहा है 
बिन आवाज़ 
कहीं कुछ जल रहा है 
बिन गंध 
कहीं मेघ बरस रहे है
बिन सावन
कहीं कोई बहक रहा है
बिन वजह
कहीं कोई गिर रहा है
बिन वजह 
कहीं रात ढल रही है 
बिन चाँद 
कहीं साज बज रहे है 
बिन बात 
कहीं बात बढ़ रही है 
बिन बात
हालात बदल रहे है 
बिन बात  
इंसान जल रहे है 
क्यों बिन बात 
कैसे पाऊं वो नज़र 
जो समझे इस मौन सत्य का राज़